रामायण का तृतीय कांड : अरण्यकाण्ड
रामायण के अरण्य काण्ड में राम के पंचवटी में कुटिया बनाने से शबरी के आश्रम पहुंचने तक का प्रसंग आता है। भरत को विदा करके राम ने चित्रकूट से प्रस्थान किया और ऋषि अत्रि के आश्रम पहुंचे। कुछ समय विश्राम के पश्चात की ओर चले। आगे उन्होंने शरभंग मुनि से भेंट की। राम के दर्शन की कामना पूर्णभोते ही मुनि ने देह त्याग दी। सुतीक्ष्ण, अगस्त्य आदि ऋषियों से भेंट करते हुए राम दण्डक वन पहुंचे। वहां वन में राजा दशरथ के मित्र गरुड़ रूपी जटायु उन्हें मिले। यहां से आगे राम ने एक अत्यंत रमणीय स्थान पंचवटी में एक झोपड़ी बनाई। कंद-मूल, फल-फूल का आहार गृहण कर सभी गुजर करने लगे। एक दिवस रावण की भगिनी शूर्पणखा वहां विचरण कर थी। राम को देख कर उनसे विवाह करने की कामना जताई। राम ने कहा : मैं तो पत्नी के साथ हूं, तुम लक्ष्मण के पास जाओ, वह अकेला है। जब शूर्पणखा लक्ष्मण के पास गई और मना करने पर भी उनसे विवाह करने का निवेदन करने लगी तो क्रोधित लक्ष्मण ने उसके नाक और कान काट दिए। शूर्पणखा खर- दूषण से सहायता लेन...