रामायण का प्रथम कांड - बालकांड
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रामायण हिंदू धर्म का अति महत्वपूर्ण व आदरणीय ग्रंथ है। रामायण में अयोध्या राज्य के राजा दशरथ एवं उनके चार पुत्रों के बाल्यकाल से लेकर भगवान श्री राम के लंका विजय और राज्याभिषेक तक की कथा का वर्णन है।
राजा दशरथ के चार पुत्र थे। राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न।रामायण के अनुसार, भरत भगवान विष्णु के पंचजन्य शंख ( Panchajanya Shankh ) के अवतार थे, जबकि उनके भाई शत्रुघ्न सुदर्शन चक्र के अवतार थे, और राम-लक्ष्मण क्रमशः विष्णु और शेषनाग के अवतार थे, जो सभी भगवान विष्णु के ही अंश थे और उनकी अलौकिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करते थे, खासकर भरत ने आदर्श भाई और प्रजापालक के रूप में शंख की भूमिका निभाई.
बालकांड: रामायण के प्रथम भाग में विश्वामित्र के अयोध्या आने से सीता जी के स्वयंवर तक का प्रसंग निहित है।
ब्रह्मऋषि विश्वामित्र गायत्री मंत्र के रचनाकार और अपने क्रोधित स्वभाव के लिए जाने जाते हैं।
एक दिवस वे ऋषि वशिष्ठ के साथ अयोध्या पहुंच कर राजा दशरथ से कहते हैं : हे राजन ! वन में अनेकों राक्षसों ने उत्पात मचा रखा है। हमारी तपस्या और यज्ञ में बाधा डाल रहे हैं। उनके संहार हेतु मुझे राम-लक्ष्मण की जरूरत है। कृपा करके आप इन्हें मुझे सौंप दें।
दशरथ जी एकदम से घबरा उठे। बोले: ऋषिवर! वृद्धावस्था में भगवद्कृपा से मुझे पुत्र-प्राप्ति हुई है। मैं 60,000 वर्ष का बूढ़ा यह विछोह नहीं सहन कर सकूंगा और फिर अभी ये 16बरस के भी नहीं है। आप मुझे अनुमति दें तो मैं राजकाज छोड़ कर चलता हूं।
विश्वामित्र क्रोधित हो गए। मुनि वशिष्ठ ने स्थिति संभालते हुए दशरथ जी से कहा : महाराज ! राजकुमारों को शस्त्र- विद्या सीखना अत्यंत आवश्यक है। वन में रहकर वे इसमें पारंगत हो सकेंगे और विश्व का कल्याण भी होगा।
तब दशरथ जी माने और दोनों राजकुमार मुनियों के साथ गौतम ऋषि के आश्रम पहुंचे।
वहां अहिल्या अपने पति गौतम ऋषि से श्राप-ग्रस्त हो हजारों वर्षों से एक शिला के रूप में खड़ी थीं।
राम के शीला को स्पर्श करते ही वे नारी रूप में लौट आईं।
बोली : नमः ते राम ! आपने मुझे पापमुक्त किया।
श्रीराम ने कहा : माता ! मैं आपके धैर्य और तप को प्रणाम करता हूं मनुष्य से गलती होती है लेकिन सत्य, धैर्य व साधना मुक्ति प्रदान करते हैं।
राम-लक्ष्मण विश्वामित्र के सानिध्य में अस्त्र- शस्त्र विद्या में निपुण होने लगे।
एक दिवस वे दोनों के साथ जनकपुरी पहुंचे।
वहां राजकुमारी सीता का स्वयंवर हो रहा था। ऋषि भी वहां पहुंचे। देखा, जनक-दरबार में आठ पहियों वाले लोहे के बक्से में रखा शिव-निर्मित धनुष 5,000 सेवकों द्वारा खींच कर लाया गया।
एक के बाद तमाम देशों के राजा जिनमें लंकापति रावण भी थे, ने धनुष तोड़ने की कोशिश की।
राजा जनक निराश हो चले। तभी उनकी दृष्टि सम्मोहित कर देने वाले दो ऋषियों पर पड़ी। उनकी पारखी नजर तुरंत भांप गई कि इतना तेज और तप किसी राजकुमार के चेहरे पर ही होता है।
राजा जनक बोले: महर्षि! मैं इन बालकों को स्वयंवर के लिए आमंत्रित करता हूं।क्या ये दोनों भी प्रयास करेंगे ?
विश्वामित्र बोले: राजन! ये दोनों अयोध्या के राजा राजकुमार राम और लक्ष्मण हैं। ये दोनों अपूर्व बलशाली, धैर्यवान और विनम्रता से संपन्न हैं। ऋषिवर का आदेश सुन राम धनुष की और बढ़े और उसे खिलोने की भांति उठा लिया।
दरबार में खलबली मच गई। परशुरामजी वहां पहुंच कर क्रोधित हो कर बोले : महादेव का धनुष किसने तोड़ा है ?
राम ने उन्हें सादर नमस्कार करके अपना परिचय दिया। परशुराम जी बोले : क्या तुम इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा सकते हो ? राम ने धनुष पर जैसे ही प्रत्यंचा चढ़ाई, परशुराम जी जान गए, यह कोई मानव नही, बल्कि साक्षात विष्णु का अवतार हैं। उनका क्रोध शांत हो गया। वे राम को प्रणाम करकर वहां से विदा हुए।
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