रामायण का द्वितीय कांड: अयोध्या काण्ड
अयोध्या काण्ड: रामायण के इस कांड में राम के राज्याभिषेक की तैयारियों से लेकर भरत के अयोध्या लौटने तक का वृतांत है।
मंथरा नाम की एक नारी रानी कैकई की दासी थी। जब राम के राज्याभिषेक का समाचार उसने सुना तो वह रानी कैकई से कहने लगी : रानी, राम राजा बन गए तो कौशल्या राजमाता बनेंगी उनका मान-सम्मान बढ़ जाएगा और सीता रानी बन जाएगी। आपकी पूछ-परख कम होने लगेगी।
कैकई ने कहा : नहीं, ऐसा नहीं होगा। राम मुझसे और भरत से बहुत स्नेह रखते हैं। वे सदैव मुझे माता के समान आदर देंगे।
मंथरा : राजा बनते ही परिस्थितियां बदल सकती हैं। महाराज दशरथ भी राम को अधिक दुलारते हैं। भरत बचपन से ही ननिहाल में पले हैं इसलिए उनका स्नेह भरत पर कम है। कैकई की मति भ्रष्ट हो गई। वह महल में बने कोपभवन में जा बैठी।
दशरथ उन्हें ढूंढते हुए वहां पहुंचे तो कैकई बोली : मुझे आपने दो वचन दिए थे। आज उन्हें पूरा करें। पहला वचन भरत को राजगद्दी और राम को 14वर्ष का वनवास दें।
दशरथ जी बोले : रानी, भरत को राज देने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है। राम भी सहर्ष तैयार हो जाएंगे।लेकिन राम को वनवास भेजने के स्थान पर आप कोई दूसरा वचन मांग लीजिए। मैं राम के बिना जीवित नहीं रहूंगा। कैकई अपनी बातों पर अड़ी रहीं।
तुरंत कैकय प्रदेश में दूत भेजकर भरत, शत्रुघ्न को अयोध्या लौटने का समाचार दिया गया।
राम के साथ भाई लक्ष्मण और रानी सीता भी वनगमन जाने के लिए वलकल वस्त्र पहनकर महल से निकलने के पूर्व महाराज दशरथ के दर्शन करने उनके महल गए।
राम, सीता और लक्ष्मण को संतों जैसी वेशभूषा में देखकर महाराज मूर्छित हो गए। कुछ समय पश्चात ही वे मृत्यु को प्राप्त हो गए।
भरत सात दिन पैदल यात्रा कर जब अयोध्या पहुंचे, तब तक राम अयोध्या छोड़ चुके थे।
उन्हें माता कैकई ने खुशी-खुशी उनके राज्याभिषेक और राम के वन-प्रस्थान का समाचार सुनाया।
भरत अत्यंत क्रोधित होते हुए बोले :माता, भैया राम आपको मां समान ही मानते हैं लेकिन आपने उन्हें वन में भेज कर ठीक नहीं किया।
यह कह कर भरत विशाल सेना लेकर राम को मनाने वन की ओर चले।
राम और भरत जब चित्रकूट नामक स्थान पर आपस में गले मिले तो दोनो भाइयों के नयनों से अश्रुधारा भी निकली। भरत-मिलाप का वर्णन अत्यंत करुणामय है। इसका वर्णन संक्षिप्त में नहीं किया जा सकता। उचित समय पर इसका वर्णन विस्तृत रूप से करेंगे।
भरत ने राम को पुनः अयोध्या लौटकर राज्य सम्हालने का आग्रह किया। राम ने भरत को समझते हुए कहा : भाई, पिता के दिए वचनों का आदर करना हमारा कर्तव्य है। तुम शोक त्याग कर प्रजा की सेवा करो और मैं वन में रहकर ईश्वर की स्तुति करूंगा।
भरत के मांगने पर राम ने अपनी चरण-पादुकाएं उन्हें सौंपी। अयोध्या आने पर राजगद्दी पर चरण- पादुकाएं रखकर भरत ने स्वयं नंदीग्राम में रहकर राजकाज आरंभ किया। अब नंदीग्राम को भारतकुंड के नाम से पहचाना जाता है जो यूपी का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है।
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