रामायण का चतुर्थ कांड : किष्किंधा कांड

   


  रामायण का चौथा कांड " किष्किंधा कांड" है। यह रामायण ग्रंथ के सात कांड में सबसे छोटा कांड है।

किष्किंधा कांड में हनुमान के द्वारा सुग्रीव से मिलन और मित्रता, बाली-वध, वानर सेना का गठन और सीता मैया की खोज में हनुमानजी का लंका गमन आदि प्रसंग हैं।


राम और लक्ष्मण पंपा सरोवर के निकट सीता की खोज में भटक रहे थे। तभी ब्राह्मण के वेश में हनुमानजी आए। और अत्यंत मधुरता से हाथ जोड़ बोले -" हे महापुरुषों ! आप अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी जान पड़ते हैं। आप किसी चिंता से व्याकुल भी दिखाई देते हैं। मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूं।"

राम,लक्ष्मण हनुमान के ज्ञान विनम्रता और सद्भावना से उन पर मोहित हो गए। श्रीराम ने कहा - " हम आपकी विनम्रता और बुद्धि से प्रभावित हुए हैं। हम आपको अपना मित्र मानते हैं।"

हनुमानजी ने उन्हें सुग्रीव से मिलाया। राम ने अपनी व्यथा सुनाई - " मेरी पत्नी सीता का हरण हो गया है। हम दोनों भाई उन्हीं की खोज में निकले है।"

सुग्रीव ने कहा - " मित्र, मेरे भाई बाली ने भी मेरा राज्य और मेरी पत्नी रूमा छीन लिए हैं।" राम बोले, मित्र आपका दुःख और मेरा दुःख समान है।  अब आपका शत्रु मेरा शत्रु है।" सुग्रीव ने प्रस्ताव रखा,  हम एक-दूसरे की मदद करेंगे। मेरी पत्नी और राज्य मिलने पर मैं वानर-सेना बना कर सीता की खोज में सहायता करूंगा।"

सुग्रीव ने बाली को युद्ध के लिए आमंत्रित  किया।

बाली की पत्नी तारा ने पति से राम और सुग्रीव के साथ सुलह के लिए कहा। पर बाली ने तारा को युद्ध में जीत कर आने का विश्वास दिलाया।

युद्ध में राम ने बाली को घायल कर दिया तब बाली बोला, "आप क्षत्रिय जान पड़ते हैं। अकारण ही किसी को मारना धर्म के विरुद्ध है। आपसे मेरी कोई शत्रुता नहीं थी फिर भी आपने मुझपे क्यों हमला किया"।

राम ने उत्तर दिया, " तुमने छोटे भाई की स्त्री को छीनकर धर्म के विरुद्ध कार्य किया है। मैं क्षत्रिय हूं और ऐसे कर्म के लिए मृत्यु-दंड ही सजा है। तुम्हे दंडित करना मेरा कर्तव्य है।बाली की मृत्यु के पश्चात् लक्ष्मण ने उसके पुत्र अंगद को मारना चाहा लेकिन राम ने अंगद को अभयदान दिया। किष्किंधा का राज्य सुग्रीव को सौंप दिया गया।

अंगद सुग्रीव की वानरसेना में शामिल हो सीता को खोजने में लगे।

 हनुमान, जामवंत,अंगद आदि के साथ वन में सीता का पता लगाने में जुटे रहे। तभी संपाति नाम का विशाल गिद्ध वहां आया।  संपाति जटायु का बड़ा भाई था। वह वानर सेना को देख उन्हें खाने के लिए झपटा पर जामवंत ने संपाति को सारी बाते बताई और जटायु के प्राणांत का दुखद समाचार दिया। संपाति ने अपनी तेज दृष्टि से देख कर बताया कि सीता लंका स्थित अशोक वाटिका में है।

राम की दी मुंदरी (अंगूठी) लिए हनुमानजी लंका की और उड़ चले।



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